अपनी अपनी पीर - दोहे

अपनी अपनी पीर

आचार्य भगवत दुबे


(1)
जिसके इंगित पर बना, यह सुंदर संसार।
बोलो वह कितना सुगढ़, होगा रचनाकार ॥

(2)
ईश्वर के प्रति यदि रखें, भक्त अडिग अनुराग ।
प्रभु कर देंगे प्रज्ज्वलित, स्वयं भक्ति की आग ॥

(3)
चाहे 'वाहे' गुरु कहो, या ईश्वर अल्लाह।
सच्चे श्रद्धावान के, होते माफ गुनाह ॥

(4)
ईश्वर-चिन्तन में सतत, रहता जिनका ध्यान।
उनके अन्तस में स्वयं, बसते हैं भगवान ॥

(5)
समाधिस्थ तन-मन रहे, निर्मल रहें विचार।
भगवन ऐसी साधना, करते हैं स्वीकार ॥

(6)
जिसकी आभा हो रही, कण-कण में द्युतिमान।
जीव-जन्तुओं में करे, प्राणों का संधान ॥

(7)
जो कहते हैं काल्पनिक, दशरथ-नंदन राम ।
वामपंथ के हैं वही, मन से मूढ़ गुलाम ॥

(8)
साईं उसको क्या मिले, जो दंभी सम्पन्न ।
सच्ची श्रद्धा-भक्ति से, दर्शन करें विपन्न ॥

(9)
विपदाओं को देखकर, हो मत व्यथित अधीर ।
रखो धैर्य विश्वास दृढ़, शंभु हरेंगे पीर ॥

(10)
ईश्वर पर विश्वास तुम, रखना सदा अटूट ।
अविश्वास से भक्ति की, डोर न जाये छूट ॥

(11)
मिलता ईश्वर-भक्ति से, हमको परमानन्द ।
मन होने पाये नहीं, निरासक्त, स्वच्छन्द ॥

(12)
दीन-दुखी के रूप में, हैं प्रभु तेरे पास।
मानवता पर राखिये, सदा अडिग विश्वास ॥

(13)
रहे बिना जल, वायु के, जीवित यदि इन्सान।
तो मानूँ प्रभु से बड़ा, है आयुर्विज्ञान ॥

(14)
धरा, व्योम, पाताल तक, जो अदृश्य है व्याप्त ।
उस ईश्वर को कर सकें, हम अनुभव से प्राप्त ॥

(15)
सहते रहते हैं विवश, अपनी भूख-पिपास।
फिर भी ईश्वर पर अडिग, रखते हैं विश्वास ॥

(16)
विषम परिस्थिति हो भले, रखिये धैर्य विवेक ।
ईश्वर पर विश्वास की, टले न अपनी टेक ॥

(17)
भाग्य-लकीरों में दिखे, भले विधाता वाम।
उनको शुभ, जो शंभु को, सुमिरें आठों याम ॥

(18)
जिनके तन पर झूम कर, लिपटे रहें भुजंग।
जला, शंभु ने काम को, जीवित किया अनंग ॥

(19)
वेग प्रभंजन का भला, कौन सका है थाम।
पवनपुत्र वश में रहें, जब दुलरायें राम ॥

(20)
पवन-वेग से उड़ चले, पवन-पुत्र तैराक ।
रुके नहीं आगे बढ़े, खड़ा रहा मैनाक ॥

(21)
दामोदर श्रीकृष्ण थे, और वृकोदर भीम।
लम्बोदर का बुद्धिबल, पूजित प्रथम असीम ॥

(22)
रण से हुआ परांगमुख, जब अर्जुन का ध्यान।
दिया पार्थ को कृष्ण ने, तब गीता का ज्ञान ॥

(23)
आकुल-व्याकुल हो गये, सारे गोपी-ग्वाल।
ज्यों ही मथुरा को गये, यदुनन्दन गोपाल ॥

(24)
गोकुल-बरसाना रहे, सदा एक मन-प्राण।
सच्चे पावन प्रेम के, राधाकृष्ण प्रमाण ॥

(25)
अभिमंत्रित कर राम ने, छोड़े विशिख समूह।
ढहा दशानन के दिये, दंभी गढ़ प्रत्यूह ॥

(26)
धरती पर आते विबुध, लेकर विविध शरीर।
अन्त करें अन्याय का, हरें मनुज की पीर ॥

(27)
विष्णु शेषशायी तथा, हैं विषपायी शंभु।
नागों से शोभित रहे, शैया, ग्रीवा कंबु ॥

(28)
रखें कलानिधि शीश पर, प्रभु शंकर भगवान।
गंग-संग विषब्याल तक, सज्जा के सामान ॥

(29)
करें बाल-लीला बहुत, अनुजों के सँग राम।
रचें रास-लीला वहीं, गोप-गोपियाँ-श्याम ॥

(30)
संतों के सान्निध्य का, वैभव जिनके पास ।
छाया रहता है वहाँ, आध्यात्मिक मधुमास ॥

(31)
अहंकारवश भिक्षु का, मत करना अपमान ।
जाने कब किस रूप में, आ जायें भगवान ॥

(32)
कृष्ण कन्हैया ने किया, 'मधु' भट का संहार।
मधुसूदन के नाम की, गूंज उठी जयकार ॥

(33)
जो ज्ञानी देकर गये, सारस्वत सौगात ।
कर्जदार हम, वे धनी, सभी ज्ञात-अज्ञात ॥

(34)
चाहत महलों की नहीं, जो हैं सन्त फकीर ।
ठुकरा देते गर्व से, वे जग की जागीर ॥

(35)
सज-धज कर आते नहीं, सभा-मध्य विद्वान ।
उनकी विद्वत्ता उन्हें, रखती आभावान ।।

(36)
जिनके मन में हैं नहीं, किंचित कुटिल विचार।
प्राप्त करें, संसार में, वे आदर सत्कार ॥

(37)
वाणी पर संयम रखो, जहाँ रहें विद्वान ।
बिना विचारे बोलकर, पाओगे अपमान ।।

(38)
विद्वानों के बीच में, रखें रदन-पट बन्द ।
लें उनके संवाद का, चुप रहकर आनन्द ॥

(39)
सांसारिकता से परे, रहे अहिंसक शुद्ध ।
महावीर, गाँधी तथा, हुए तथागत बुद्ध ॥

(40)
जिनमें चारु चरित्रता, लज्जा ललित ललाम ।
उन ललनाओं ने किया, कुल का ऊँचा नाम ॥

(41)
लक्ष्मण औ' शत्रुघ्न ये, सगे सहोदर भ्रात।
दशरथनन्दन थे उभय, रही सुमित्रा मात ॥

(42)
उमा, रमा इन्द्राणियाँ, सभी दिव्यता-मूर्ति।
करतीं करुणा-भाव से, सबकी इच्छा-पूर्ति ॥

(43)
नन्हें नटखट जब कभी, जाते हमसे रूठ।
उन्हें मनाने बोलते, जाने कितने झूठ ॥

(44)
जाति-धर्म से दूर है, बच्चों का संसार।
घृणा-द्वेष नफरत नहीं, जानें निश्छल प्यार ॥

(45)
मन से मानव-जाति का, करिये मंगल-गान ।
तभी विश्व-कल्याण का, होगा नया विहान ॥

(46)
कभी आंशिक तो कभी, ग्रहण पूर्ण खग्रास ।
समझें हम विज्ञान को, तजें अंधविश्वास ॥

(47)
रेवातट पर मालवा, है उर्वरा कछार।
भरती रही अनाज से, भूमि विपुल भंडार ॥

(48)
सिखा दिया है विश्व को, गणित और विज्ञान ।
भारत ने ही है दिया, उसे दशमलव ज्ञान ॥

(49)
परिवर्तित करता प्रकृति, कभी ग्रहों का योग।
यह खगोल का खेल है, मत मानो दुर्योग ॥

(50)
लोक रीतियों को कभी, वृथा न कहिये आप।
जीवन के गतिमान हों, इनसे क्रिया कलाप ॥

(51)
अब तक झुलसाते मुझे, श्रमिकों के सन्ताप।
करते हैं बेचैन वे, क्रन्दन और विलाप ॥

(52)
फिरते हैं अब भी यहाँ, भूखे वस्त्र-विहीन ।
इज्जत ढंकने के लिये, हैं दुर्लभ कौपीन ॥

(53)
भूख-प्यास की भी भला, होती कोई जात।
विपदा किन्तु गरीब को, देती रहती मात ॥

(54)
पड़ते रहते हैं, जहाँ, सूखा और अकाल ।
ऐसी जगहों पर खुलें, फैक्टरियाँ तत्काल ॥

(55)
गोपन रखते सर्वदा, अपने मन की पीर।
पीड़ा को जो पी सके, वही धीर गंभीर ॥

(56)
डली नमक की, साथ में, सूखी रोटी प्याज ।
चल पड़ता है काम पर, निर्धन श्रमिक समाज ॥

(57)
भूख, गरीबी का यहाँ, है संबन्ध प्रगाढ़।
इनका भोजन छीनती, शोषणकारी दाढ़ ॥

(58)
यूँ तो उन्नति कर रहा, अपना हिन्दुस्तान ।
सुलभ न कुछ को आज भी, भोजन, वस्त्र, मकान ॥

(59)
मंदिर, मस्जिद, चर्च में, मत कराइये बैर।
ईश्वर, अल्ला, ख्रीष्ट तो, चाहें सबकी खैर ॥

(60)
भाईचारे की हमें, शिक्षा देते गाँव।
जहाँ न जम पाते कभी, घृणा, द्वेष के पाँव ॥

(61)
माँ के चरणों में रहे, जिनकी निश्छल भक्ति।
प्रभु अपने आशीष की, देते उनको शक्ति ॥

(62)
है पुरखों की कीर्ति का, आस-पास मकरन्द।
उनके प्रति आभार के, मैं रचता हूँ छन्द॥

(63)
आगन्तुक-सँग प्रेम से, मिलिये बाँह पसार।
भले शत्रु ही हो खड़ा, आकर अपने द्वार॥

(64)
था इस भारतवर्ष में, सदा सनातन धर्म।
हैं जिसके अनुसरण में, सारे सात्त्विक कर्म॥

(65)
प्राणवन्त सद्भाव से, अब भी दिखते गाँव।
रिश्तों की छतनार है, जहाँ घनेरी छाँव॥

(66)
जहाँ अतिथि सत्कार हो, मिले बड़ों को मान।
खुशियों का रहता वहीं, शीतल सघन वितान॥

(67)
किया नवागत अब्द, अभिनन्दन सत्कार।
कर ली उत्सव धर्मिता, इसी तरह साकार॥

(68)
चैत्र मास की प्रतिपदा, नव संवत्सर मान।
हम विक्रम आदित्य का, करते गौरव-गान॥

(69)
अधुनातन के सामने, चुने पुरातन कौन।
देख सभ्यता का चलन, संस्कृति रहती मौन॥

(70)
नीर, पंकज, तामरस, सरसिज नाम अनेक।
लक्ष्मीजी को प्रिय लगे, कमल सरोरुह एक॥

(71)
सदाचार से ही मिले, पुरस्वरण को मान।
और मंगलाचरण है, ईश्वर का गुणगान॥

(72)
होता है संसार से, जब वैराग्य-विमोह।
तकें साधना के लिये, ऋषि-मुनि कंदरखो॥

(73)
उनको क्या संसार से, जो पागल विक्षिप्त।
फिरते हैं अवधूत से, माया से निर्लिप्त॥

(74)
जिन पुरुषों के नाम से, अर्पित करते पिंड।
कहते हिन्दू-धर्म में, उनको सभी सपिंड॥

(75)
बहुत सगे भी भूलवश, रखते हमसे द्रोह।
उनका भी करते नहीं, हम बदरक्षित विछोह॥

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