अपनी अपनी पीर आचार्य भगवत दुबे (1) जिसके इंगित पर बना, यह सुंदर संसार। बोलो वह कितना सुगढ़, होगा रचनाकार ॥ (2) ईश्वर के प्रति यदि रखें, भक्त अडिग अनुराग । प्रभु कर देंगे प्रज्ज्वलित, स्वयं भक्ति की आग ॥ (3) चाहे 'वाहे' गुरु कहो, या ईश्वर अल्लाह। सच्चे श्रद्धावान के, होते माफ गुनाह ॥ (4) ईश्वर-चिन्तन में सतत, रहता जिनका ध्यान। उनके अन्तस में स्वयं, बसते हैं भगवान ॥ (5) समाधिस्थ तन-मन रहे, निर्मल रहें विचार। भगवन ऐसी साधना, करते हैं स्वीकार ॥ (6) जिसकी आभा हो रही, कण-कण में द्युतिमान। जीव-जन्तुओं में करे, प्राणों का संधान ॥ (7) जो कहते हैं काल्पनिक, दशरथ-नंदन राम । वामपंथ के हैं वही, मन से मूढ़ गुलाम ॥ (8) साईं उसको क्या मिले, जो दंभी सम्पन्न । सच्ची श्रद्धा-भक्ति से, दर्शन करें विपन्न ॥ (9) विपदाओं को देखकर, हो मत व्यथित अधीर । रखो धैर्य विश्वास दृढ़, शंभु हरेंगे पीर ॥ (10) ईश्वर...