फ़ाइल में दबी आवाज़ें: एक अनकहा किस्सा
जाने क्या बात है
वेदवती सेन रोज की तरह घर की स्टडी में बैठी थी, दोपहर की हल्की धूप खिड़की से आती, उसकी कलाई पर पड़ती, एक सुकून सा देती थी। अभी-अभी उसने 'तुला' पर अपना लेख पूरा किया था, एक ऐसा काम जो उसे सिर्फ़ पैसा ही नहीं, बल्कि अंदरूनी तसल्ली भी देता था। ट्रांसलेशन, प्रूफ़रीडिंग, 'गाँव कनेक्शन' जैसी मैगज़ीन के लिए लिखना—इन्हीं सब में उसके दिन मज़े से गुज़रते थे।
आज फ़ाइलें समेटते हुए, उसने कंप्यूटर पर 'अटैच फ़ाइल' पर क्लिक किया। तभी, उसकी उंगली से बस यूँ ही एक पुराना फ़ोल्डर खुल गया: /personal_NJ/। यह फ़ोल्डर उसने पहले कभी देखा नहीं था। एक हल्की सी क्यूरियोसिटी हुई। अंदर बस एक अकेली फ़ाइल थी, नाम था: "Tears, Fears, Spheres.pdf"। ऐसा नाम था कि दिल में हलचल मचा दे, एक अजीब सी बेचैनी भर दे। उसने पल भर सोचा, फिर क्लिक कर दिया।
अंदर, डॉक्यूमेंट में उन्नीस कविताएँ थीं, एक एकांकी और एक छोटी कहानी। उन पर किसी का नाम नहीं था, लेकिन लिखने का अंदाज़, शब्दों की बनावट, हर लाइन में साँस लेती आवाज़, साफ़-साफ़ नरेंद्र की थी—उसके पति की। यह वही आवाज़ थी जिसे उसने अपने कमरे की ख़ामोशी में अनगिनत बार कविताएँ पढ़ते सुना था, देर रात तक जब शहर भी सो जाता था। पर यह उस नरेंद्र की आवाज़ नहीं थी जो सुबह उठकर उसे चाय बनाकर देता था, जो हर छोटी-बड़ी बात पर सोच-समझकर राय देता था। यह आवाज़ कुछ और थी। जवानी का जोश था उसमें, एक अजीब सी बेपरवाही थी, और खुला प्यार—हालांकि, उसे महसूस हुआ, शायद यह प्यार उसके लिए नहीं था, या शायद कभी नहीं था।
सोलहवीं कविता तक पहुँचते-पहुँचते, उसे लगा वह सिर्फ़ शब्द नहीं पढ़ रही, बल्कि किसी अनकही पहेली को सुलझा रही है, एक ऐसे अजनबी को पहचान रही है जो उसके अपने पति के भीतर कहीं छुपा था। "श्यामाॅल बाॅरन, साॅक्थो गाॅठन / काॅतो राॅतने जाॅड़ा जौबन।" साँवली रंगत। गढ़े हुए बदन-सी काया। शब्द इतने गहरे, इतने सच्चे थे कि उन्हें सिर्फ़ कोरी कल्पना नहीं कहा जा सकता था। ये सब तो यादें थीं, किसी की मौजूदगी का पुख़्ता सबूत। एक पल के लिए उसने कंप्यूटर बंद किया, गहरी साँस ली, फिर दोबारा खोला।
आँखों में नमी नहीं थी उस पल। अभी नहीं। उसने पूरी फ़ाइल प्रिंट कर ली। एक-एक पन्ने को ध्यान से पढ़ा, जो पंक्तियाँ दिल को छूती थीं, उन पर हल्के निशान लगाए। जो बातें सबसे ज़्यादा चुभ रही थीं, उन पर लाल घेरा बनाया। जैसे-जैसे वह पढ़ती गई, दिल में एक अजीब सा दर्द उठता गया। पन्नों को एक साथ स्टेपल करके एक मोटी फ़ाइल बनाई और उसे कॉफ़ी टेबल पर रख दिया। उस ख़ामोशी में, जो बाद में कमरे में पसर गई थी, उसे एक नाम याद आया - जस्सी। जो नाम अब तक अजनबी था, अब उसकी चेतना पर छा चुका था।
शब्द अपर्याप्त है
शाम ढल चुकी थी जब नरेंद्र घर आया। दिन भर की भाग-दौड़ और ऑफ़िस का बोझ उसके कंधों से उतर चुका था। उसने अपनी रोज़ की तरह कड़क दार्जिलिंग चाय बनाई, आचार्य प्रशांत की किताब खोलते हुए धीमा-सा गुनगुना रहा था। कमरे में पसरी ख़ामोशी पर उसकी नज़र देर से पड़ी, एक ऐसी ख़ामोशी जो वेदवती के स्वभाव से अलग थी—भारी, कुछ कहती हुई।
वेदवती चुपचाप अंदर आई, हाथ में वही फ़ाइल थी। उसने नरेंद्र के सामने मेज़ पर रख दी, जैसे कोई भारी पत्थर रख रही हो। नरेंद्र ने चाय का कप उठाया ही था। उसकी नज़र पहले फ़ाइल पर पड़ी, फिर वेदवती के चेहरे पर। वेदवती की आँखों में सवाल थे, गहरे, बेहिसाब।
"जस्सी कौन है?" वेदवती ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, जो कपकपाते हाथों से चाय के कप तक पहुँच रही थी।
नरेंद्र ने ऊपर देखा, चेहरा एक पल को बिल्कुल ख़ाली हो गया। फिर एक उलझन-सी दिखी। "जस्सी कौन?" उसने सवाल दोहराया, जैसे वह सच में न जानता हो।
वेदवती ने प्रिंटआउट खोला और पढ़ना शुरू किया: "क्या यह काम वासना? या है यह उपासना! शायद भक्ति! या केवल आसक्ति?" उसकी आवाज़ में इतनी थरथराहट थी कि उन पंक्तियों को पढ़ते हुए जैसे उनमें ही एक दर्द भरी धुन घुल गई हो, एक अनकही व्यथा।
नरेंद्र ने माथा सहलाया। "वेदू... ये तो बस मन के ख्याल थे। कोई सच नहीं। लिखने के लिए कुछ भी लिख दिया होगा, बस..." उसकी आवाज़ में कहीं एक कमज़ोरी थी, जो वेदवती ने पहचान ली थी।
वेदवती ने एक और पंक्ति पढ़ी, उसकी आवाज़ अब थोड़ी और दृढ़ थी: "That night I grew passionate / Over your figure that is great."
नरेंद्र ने अपनी किताब बंद कर दी, जैसे अचानक उसकी सारी एनर्जी ख़त्म हो गई हो। अब कोई बहाना काम आने वाला नहीं था। "हाँ, जस्सी थी," उसने कहा, आवाज़ इतनी धीमी कि मुश्किल से सुनाई दी, पर हर शब्द दिल पर चोट कर रहा था। "उसका नाम जैस्मीन था। जैस्मीन मुरमू। हम निरशा में काम करते हुए मिले थे। बहुत पुरानी बात है। तुमसे पहले की। ये रिश्ता ज़्यादा दिन नहीं चला। इसका कुछ मतलब था। और फिर नहीं रहा।" उसने न कोई सफ़ाई दी, न बात बढ़ाई। उसने वेदवती की आँखों में नहीं देखा। बस चुपचाप कमरे से उठ गया, जैसे कोई अदृश्य बोझ उसे खींच रहा हो। वेदवती वहीं बैठी रह गई, शब्दों का बोझ उसके ऊपर जमा होता जा रहा था।
बड़ी गीली रात है
नरेंद्र बरामदे में बैठा रहा। शहर की हल्की आवाज़ें, दूर से आती गाड़ियों का शोर, सब उस पर बेअसर थे। उसके भीतर एक पुराना तूफ़ान फिर से उठ खड़ा हुआ था, और मन धीरे-धीरे निरशा की उन गलियों में लौट रहा था, जहाँ अतीत की बारिशें आज भी बरस रही थीं।
जैस्मीन शायद अठारह या उन्नीस की थी, जब वह पहली बार 'रंग दे' के दफ़्तर आई थी। अपनी गॉडपैरेंट, नमिता साहा के साथ। जैस्मीन ने खुद को ऐसे पेश किया, जैसे वह अपने दम पर खड़ी हो, आत्मविश्वास से भरी, भले ही उसे कभी कुछ आसानी से न मिला हो। उसे काम की ज़रूरत थी। नालंदा में उसके बीए-बीएड कोर्स का ख़र्च तो स्कॉलरशिप से चलता था, लेकिन राजगीर में रहने का ख़र्चा भारी पड़ता था। व पार्ट-टाइम काम करना चाहती थी, कुछ भी हो। नरेंद्र ने देखा था कि उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—सपनों की, उम्मीदों की।
नरेंद्र, तब मुश्किल से तीस का रहा होगा, एक छोटे से माइक्रो-क्रेडिट प्रोजेक्ट को चला रहा था। जोश बहुत था, पर टीम छोटी थी। उसके पास किसी को अस्थाई रूप पर भी रखने का बजट नहीं था, पर जैस्मीन के जाने के बाद भी उसकी मौजूदगी का एहसास बना रहा, एक अजीब सी कमी जो महसूस होती थी। उसने उसे काम पर रख लिया।
उन्होंने साथ मिलकर खूब काम किया। फील्ड पर जाना, घंटों बिताना, अपने सपनों को एक-दूसरे से बाँटना। वह सिस्टम बदलना चाहता था; वह अपनी ज़िंदगी को। उनके बीच एक रिश्ता पनपा जो शब्दों से परे था। जैस्मीन के साथ बिताया हर पल उसे भीतर से बदल रहा था। उसने अपने शुरुआती दिनों में डायरी में लिखा था: "क्या यह काम वासना? / या है यह उपासना! / शायद भक्ति! / या केवल आसक्ति?" वह उन दिनों अपनी वासनाओं से बहुत जूझता था, मानता था कि "मैं दुनिया में सबसे ज़्यादा वासना में डूबा हुआ व्यक्ति था।"
पर जैस्मीन, या यूँ कहो कि उसके होने के अंदाज़ ने, उसके भीतर कुछ बदलना शुरू कर दिया था। उसे याद आया कि कैसे उसने जैस्मीन को अपनी 'आध्यात्मिक बहन' कहा था, उसे 'सूप' कहकर पुकारता था। उसके अनुसार, जैस्मीन का "प्रेम, शांति और पवित्रता का अस्तित्व" एक "जलती हुई मोमबत्ती" की तरह था जिसने उसे भीतर से रोशन किया, उसे वासना के अँधेरे से बाहर निकाला। उसे चूमने का जो सपना उसने देखा था, और उस सदमे ने उसे एक नए जीवन के लिए जगाया, यह उसके लिए एक बड़ा मोड़ था। उसने उसे एक "टाइम पास लड़की" या "सिर्फ़ जिस्म" के तौर पर नहीं देखा, बल्कि "मेरे सबसे गहरे मंदिर की देवी" के रूप में, "जो हमेशा एक मार्गदर्शक रोशनी के रूप में मौजूद है / जिसके सीने पर मैं अपना दिल रखता हूँ।" यह सिर्फ़ प्यार नहीं था; यह एक गहरी समझ थी। वह जैस्मीन के साथ रहते हुए कई बातों से भी गुज़रा था, "सितंबर इलेवन" की तरह उस पर "इरादों पर सवाल" उठे थे, पर उसके बावजूद जैस्मीन के लिए उसकी भावनाएँ पाक थीं।
एक तूफानी रात ऐसी आई जब घर लौटना ख़तरे से ख़ाली नहीं था। जैस्मीन वहीं रुक गई। यह सब सोचा-समझा नहीं था, बस कुदरती था। अगली सुबह, वह जल्दी ही चली गई। न कोई वादे हुए, न कोई इज़हार। बस एक अनकही बात थी, एक गहरी ख़ामोशी। उसने उसे फिर कभी नहीं देखा। वह जैस्मीन थी। फिर जस्सी। और फिर बस उन कविताओं के शब्द जो उसने कभी किसी को नहीं दिखाए थे, एक अधूरा अध्याय जो उसके दिल में कहीं छुपा रह गया था।
तेरा मेरा साथ है
रात भर वेदवती करवटें बदलती रही। नरेंद्र के शब्द उसके कानों में गूँजते रहे, और उसके मन में जैस्मीन का अनदेखा चेहरा घूमता रहा। ईर्ष्या से ज़्यादा, उसे एक अजीब सी उदासी थी—अपने पति के जीवन के एक ऐसे हिस्से को जानने की उदासी, जहाँ वह कभी थी ही नहीं। यह सिर्फ़ एक लव-स्टोरी नहीं थी, यह नरेंद्र के भीतर के संघर्ष और उसके बदले हुए रूप की कहानी थी। उसने महसूस किया कि जैस्मीन ने नरेंद्र को कहीं गहरे से छुआ था, और इस एहसास ने उसे एक नए नरेंद्र से मिलवाया था, जिसे वह अब और बेहतर समझने लगी थी।
सुबह के सात बजे थे। पड़ोसी के मिक्सर ग्राइंडर की तेज़ आवाज़ ने चुप्पी तोड़ दी। वेदवती हिली। नरेंद्र उसके बगल में था। वह सो नहीं रहा था, पर पूरी तरह जागा भी नहीं था। वेदवती कुछ नहीं बोली। उसने बस अपना हाथ बढ़ाया और उसका सिर अपने सीने पर रख लिया, उंगलियाँ धीरे-धीरे उसके बालों में घूम रही थीं, जैसे कोई पुरानी धुन छेड़ रही हों।
बाहर, नवदर्शनम से सब्जियों का ट्रक जल्द ही आने वाला था। उनका बरामदा दोपहर तक एक छोटी सब्जी मंडी बन जाएगा। पड़ोसी तोरई को लेकर मोलभाव करेंगे। बच्चे आमों के लिए झगड़ेंगे। दुनिया अपनी रोज़मर्रा की राह पर चल पड़ेगी। रोज़मर्रा की ज़िंदगी का शोर बाहर था, पर इस कमरे में, जो शांति थी, वो महज़ ख़ामोशी नहीं थी। वो सब कुछ जान लेने के बाद की शांति थी। एक ऐसी माफ़ी जहाँ कुछ भुलाया नहीं जाता, बस स्वीकार कर लिया जाता है। एक ऐसा ठहराव, जो एक शांत दुआ जैसा लगा, जिसमें अतीत और वर्तमान एक साथ घुल गए थे, एक नया सामंजस्य बना रहे थे।

.png)
.png)

Comments
Post a Comment